पहला ‘जयपाल सिंह मुंडा राष्ट्रीय आदिवासियत सम्मान’ इंदौर की सुशीला धुर्वे को

पहला ‘जयपाल सिंह मुंडा राष्ट्रीय आदिवासियत सम्मान’ इंदौर की सुख्यात गोंड आदिवासी लेखिका सुशीला धुर्वे को दिया जाएगा। गोंडी साहित्य, इतिहास और संस्कृति के क्षेत्र में उनके बौद्धिक योगदान के लिए यह प्रतिष्ठित सम्मान उन्हें 7 मई को रांची में आयोजित अखड़ा महासम्मेलन में प्रदान किया जाएगा। 57 वर्षीय श्रीमती सुशीला धुर्वे इंदौर, मध्य प्रदेश की रहने वाली हैं और गोंडी धर्म, भाषा-साहित्य और इतिहास पर उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हैं। यह जानकारी आज झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा की आयोजन समिति की ओर से वंदना टेटे और चयन समिति के संयोजक केएम सिंह मुंडा ने दी।

वंदना टेटे ने बताया कि जयपाल सिंह मुंडा झारखंड गठन और भारतीय राजनीति में आदिवासियत के शीर्ष सिद्धांतकार हैं। 50 के दशक में जब भारतीय संविधान की रचना हो रही थी उन्होंने देश के तीन करोड़ भारतीय आदिवासियों के हक-हकूक को सुनिश्चित करने के लिए झारखंड के आदिवासी आंदोलन से हरसंभव दबाव बनाया। संविधान में आदिवासी हक-अधिकार और झारखंड उन्हीं की देन है। दुर्भाग्य है कि झारखंड और देश ने उन्हें भुला दिया है। इसीलिए अखड़ा ने उनके नाम पर यह राष्ट्रीय सम्मान देने की पहल की है।

सम्मान चयन समिति के संयोजक और अखड़ा के प्रवक्ता केएम सिंह मुंडा ने कहा कि पहले ‘जयपाल सिंह मुंडा राष्ट्रीय आदिवासियत सम्मान’ के लिए योग्य आदिवासी व्यक्तित्व का चुनाव बहुत मुश्किल था। हमारे पास कई लोगों के नाम देशभर से आए थे। लेकिन चयन समिति ने सर्वसम्मति से श्रीमती सुशीला धुर्वे का चुनाव किया। वे न सिर्फ एक ‘सेल्फमेड’ आदिवासी विदूषी, लेखिका और इतिहासकार हैं बल्कि लोकप्रिय समाजकर्मी भी हैं। गोंडी भाषा, धर्म और संस्कृति पर आपकी दो महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं - ‘मेरा गोंडवाना महान’ (2012) और ‘जय गोंडवाना: धर्म, भाषा और इतिहास’ (2014)। हिंदी में आपका एक कथा संकलन ‘बैन गंगा’ (2012) भी प्रकाशित है। श्री मुंडा ने बताया कि समाज, साहित्य, संस्कृति, कला और बौद्धिक क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए इस वर्ष से शुरू किया गया यह सम्मान हर तीन साल पर किसी एक आदिवासी व्यक्तित्व को उनके विशिष्ट योगदान के लिए प्रदान किया जाएगा।

श्रीमती धुर्वे को यह सम्मान ‘झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा’ के चौथे महासम्मेलन के दूसरे दिन 7 मई 2017 को मराठी के सुप्रसिद्ध आदिवासी साहित्यकार श्री वाहरू सोनवणे प्रदान करेंगे। सम्मान के अवसर पर बहुजन साहित्यकार और पूर्व सांसद प्रेमकुमार मणि, सुप्रसिद्ध आलोचक और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डा. चौथीराम यादव, बारपदा, उड़ीसा की वरिष्ठ लेखिका डा. दमयंती बेसरा सहित अनके गणमान्य अतिथि उपस्थित रहेंगे।

वंदना टेटे
केएम सिंह मुंडा

झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा
रांची (झारखंड)