हासा-भाषा की ग्लोबल लूट की छूट नहीं

प्रिय संगी साथियो
जोहार!

झारखंड के साथ-साथ भारत के अन्य राज्यों में रह रहे करोड़ों झारखंडियों का अस्तित्व आज भी दाव पर लगा हुआ है। 1947 में अंग्रेजों के चले जाने के बाद भारत के अन्य नागरिकों की तरह ही झारखंडियों से भी यही वादा किया गया था कि देश में हम भी अपने पुरखा अधिकारों के साथ जी सकेंगे। जल, जंगल, जमीन पर हमारा हक हमें दे दिया जाएगा। इसके लिए संविधान में कुछ प्रावधान भी रखे गए, लेकिन आजादी के बाद राष्ट्र-निर्माण और विकास की जो प्रक्रिया शुरू हुई, उससे जल्दी यह अनुभव हो गया कि हम केवल नाम के स्वतंत्र हुए हैं। क्योंकि आजादी मिलते ही केन्द्र एवं राज्य सरकारों ने विकास के नाम पर हमारे प्राकृतिक संसाधनों और आजीविका के स्रोतों पर हमला बोल दिया। सत्ता, पुलिस-सेना और राज्य प्रायोजित अपराधियों के सहारे हमें विस्थापित करने का अमानवीय सिलसिला पिछले 70 सालों से जारी है। विकास और मुख्यधारा में शामिल करने तथा संस्कृतीकरण के नाम पर हमारी भाषा-संस्कृति छीन ली गई। हमारे सरना और जाहेर स्थलों को खदानों में दफन कर दिया गया। हूल और उलगुलान की ऐतिहासिक चेतना को दबाने के लिए झूठा इतिहास पढ़ाया जा रहा है। पुरखा अधिकारों की बहाली, आत्मनिर्णय के अधिकार और परंपरागत स्वशासन की आकांक्षा को मिटाने के लिए मातृभाषाओं को शिक्षा और पढ़ाई के दायरे से बाहर कर दिया। नतीजतन, मुण्डा, खड़िया, हो, कुड़ुख, संताली सहित बिरहोरी, असुरी, मालतो जैसी आदिम एवं खोरठा, नागपुरी, पंचपरगनिया, कुरमाली जैसी हमारी क्षेत्राीय भाषाएं आज भी अपने अस्तित्व और संविधानसम्मत सम्मान के लिए जूझ रही हैं।

जिस अलग झारखंड के लिए हमारे आदिवासी-सदान लड़ाकों ने खुद को कुरबान किया, वह 15 नवंबर 2000 में जरूर बना, पर हमारे लिए नहीं। हमें और लूटने के लिए। देशी-विदेशी, राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लूट की खुली छूट देने के लिए। विरोध करने पर पुरखा झारखंड के कलिंगा, तोरपा, लालगढ़, नंदीग्राम-सिंगुर, पोटका, काठीकुंड आदि जगहों पर आदिवासियों-मूलवासियों का बड़े पैमाने पर जनसंहार हुआ। जल, जंगल, जमीन और पुरखा अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे आदिवासियों एवं मूलवासियों के शांतिपूर्ण जनांदोलनों को माओवाद-नक्सल के नाम पर रोज कुचला जा रहा है। झारखंड में जिस सीएनटी और एसपीटी एक्ट को हमारे शहीदों ने अंग्रेजों से लड़कर लागू करवाया था, उसे झारखंड की भाजपा सरकार ने संशोधन कर निष्प्रभावी कर दिया है। और नई डोमिसाइल नीति को लागू कर झारखंडियों के मूलभूत अधिकार को छीन लिया है। आदिवासी-मूलवासी एकता को सरना-ईसाई-हिंदू धर्म के नाम पर तोड़ा जा रहा है।

साथियो, लंबी लड़ाई के बाद झा.भा.सा.सं. अखड़ा की अगुआई में 2011 में सभी झारखंडी भाषाओं को द्वितीय राजभाषा का दर्जा मिला। परंतु प्राथमिक स्तर से मातृभाषाओं में पढ़ाई, देशज-आदिवासी भाषा-साहित्य अकादमी एवं कला-संस्कृति अकादमी/संस्थानों, राज्य के सभी कॉलेजों-विश्वविद्यालयों में झारखंडी भाषा विभागों की स्थापना तथा शिक्षक-लेक्चरर की नियुक्तियां अभी तक नहीं की गयी। जेपीएससी, शिक्षक बहाली एवं अन्य प्रतियोगी परिक्षाओं में झारखंडी भाषाओं को अप्रभावी बना देने से आदिवासी-मूलवासी बेरोजगार हताश हो चले हैं। पलायन और मानव-तस्करी भयावह बन चुकी है।

इन्हीं सब सवालों पर 6-7 मई 2017 को रांची में झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा का दो दिवसीय चौथा महासम्मेलन आयोजित होने जा रहा है। विकास के झूठे वादे और दमन के खिलाफ सांस्कृतिक प्रतिकार समय की मांग है। रघुवर सरकार द्वारा ‘मोमेंटम झारखंड’ के नाम पर की जाने वाली लूट का रचनात्मक प्रतिकार जरूरी है और हम ‘हाथी उड़ता है’ के झूठे झांसे में नहीं आनेवाले। आइए, अपने गीतों, कहानियों और नाच-गान से जनविरोधी सरकार को खबरदार करें कि हासा-भाषा की ग्लोबल लूट की छूट नहीं।

हासा (माटी) और भासा (संस्कृति) बचाइए, महासम्मेलन में जरूर आइए।

निवेदकः
संयोजक, चौथा महासम्मेलन तैयारी समिति
झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा