अखड़ा महासम्मेलन 2017: प्रेस-विज्ञप्तियां

पहला ‘जयपाल सिंह मुंडा राष्ट्रीय आदिवासियत सम्मान’ इंदौर की सुशीला धुर्वे को

प्रेस-विज्ञप्ति/23 अप्रैल 2017

पहला ‘जयपाल सिंह मुंडा राष्ट्रीय आदिवासियत सम्मान’ इंदौर की सुख्यात गोंड आदिवासी लेखिका सुशीला धुर्वे को दिया जाएगा। गोंडी साहित्य, इतिहास और संस्कृति के क्षेत्र में उनके बौद्धिक योगदान के लिए यह प्रतिष्ठित सम्मान उन्हें 7 मई को रांची में आयोजित अखड़ा महासम्मेलन में प्रदान किया जाएगा। 57 वर्षीय श्रीमती सुशीला धुर्वे इंदौर, मध्य प्रदेश की रहने वाली हैं और गोंडी धर्म, भाषा-साहित्य और इतिहास पर उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हैं। यह जानकारी आज झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा की आयोजन समिति की ओर से वंदना टेटे और चयन समिति के संयोजक केएम सिंह मुंडा ने दी।

वंदना टेटे ने बताया कि जयपाल सिंह मुंडा झारखंड गठन और भारतीय राजनीति में आदिवासियत के शीर्ष सिद्धांतकार हैं। 50 के दशक में जब भारतीय संविधान की रचना हो रही थी उन्होंने देश के तीन करोड़ भारतीय आदिवासियों के हक-हकूक को सुनिश्चित करने के लिए झारखंड के आदिवासी आंदोलन से हरसंभव दबाव बनाया। संविधान में आदिवासी हक-अधिकार और झारखंड उन्हीं की देन है। दुर्भाग्य है कि झारखंड और देश ने उन्हें भुला दिया है। इसीलिए अखड़ा ने उनके नाम पर यह राष्ट्रीय सम्मान देने की पहल की है।

सम्मान चयन समिति के संयोजक और अखड़ा के प्रवक्ता केएम सिंह मुंडा ने कहा कि पहले ‘जयपाल सिंह मुंडा राष्ट्रीय आदिवासियत सम्मान’ के लिए योग्य आदिवासी व्यक्तित्व का चुनाव बहुत मुश्किल था। हमारे पास कई लोगों के नाम देशभर से आए थे। लेकिन चयन समिति ने सर्वसम्मति से श्रीमती सुशीला धुर्वे का चुनाव किया। वे न सिर्फ एक ‘सेल्फमेड’ आदिवासी विदूषी, लेखिका और इतिहासकार हैं बल्कि लोकप्रिय समाजकर्मी भी हैं। गोंडी भाषा, धर्म और संस्कृति पर आपकी दो महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं - ‘मेरा गोंडवाना महान’ (2012) और ‘जय गोंडवाना: धर्म, भाषा और इतिहास’ (2014)। हिंदी में आपका एक कथा संकलन ‘बैन गंगा’ (2012) भी प्रकाशित है। श्री मुंडा ने बताया कि समाज, साहित्य, संस्कृति, कला और बौद्धिक क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए इस वर्ष से शुरू किया गया यह सम्मान हर तीन साल पर किसी एक आदिवासी व्यक्तित्व को उनके विशिष्ट योगदान के लिए प्रदान किया जाएगा। श्रीमती धुर्वे को यह सम्मान ‘झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा’ के चौथे महासम्मेलन के दूसरे दिन 7 मई 2017 को मराठी के सुप्रसिद्ध आदिवासी साहित्यकार श्री वाहरू सोनवणे प्रदान करेंगे। सम्मान के अवसर पर बहुजन साहित्यकार और पूर्व सांसद प्रेमकुमार मणि, सुप्रसिद्ध आलोचक और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डा. चौथीराम यादव, बारपदा, उड़ीसा की वरिष्ठ लेखिका डा. दमयंती बेसरा सहित अनके गणमान्य अतिथि उपस्थित रहेंगे।

वंदना टेटे
केएम सिंह मुंडा
झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा


अखड़ा महासम्मेलन में जुटेंगे आठ राज्यों के आदिवासी-मूलवासी संस्कृतिकर्मी

प्रेस-विज्ञप्ति/16 अप्रैल 2017

‘झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा’ का चौथा महासम्मेलन 6-7 मई 2017 को रांची में आयोजित होगा। महासम्मेलन का उद्घाटन बहुजन चिंतक और पूर्व सांसद प्रेम कुमार मणि करेंगे। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष और प्रखर आलोचक-साहित्यकार डा. चौथीराम यादव मुख्य वक्ता होंगे। ओड़िसा की वरिष्ठ संताली साहित्यकार डा. दमयंती बेसरा और मध्यप्रदेश की सुप्रसिद्ध गोंड लेखिका डा. सुशीला धुर्वे इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के तौर पर शिरकत करेंगी। चौथे महासम्मेलन की केन्द्रीय थीम है - हासा-भाषा की ग्लोबल लूट की छूट नहीं। महासम्मेलन रांची विश्वविद्यालय, रांची के मोरहाबादी स्थित शहीद स्मृति केन्द्रीय पुस्तकालय सभागार में आयोजित होगा। इस दो दिवसीय सांस्कृतिक जुटान में छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा, असम, अंडमान, मध्य प्रदेश और झारखण्ड सहित देश भर से करीब 300 से अधिक आदिवासी-मूलवासी देशज लेखक, भाषाविद, साहित्यकार, कलाकार, पत्रकार, संस्कृतिकर्मी और बुद्धिजीवी शामिल होंगे। यह जानकारी आज अखड़ा के केन्द्रीय प्रवक्ता केएम सिंह मुंडा ने दी।

अखड़ा द्वारा जारी विज्ञप्ति में प्रवक्ता केएम सिंह मुंडा ने बताया है कि तीन वर्ष के अंतराल पर होनेवाला यह महासम्मेलन झारखंडी अस्मिता, भाषाई पहचान और जल, जंगल, जमीन पर पुरखौती अधिकार की बहाली के सवाल पर केन्द्रीत होगा। आज देश के आदिवासी एवं मूलनिवासी लोग शासक वर्ग की राष्ट्रवादी और साम्राज्यवादी नीतियों के कारण संकट में हैं। भारत के राजनीतिक चिंतकों और पार्टियों के लिए आदिवासी-देशज समुदायों के सवाल महज ‘आर्थिक’ बनकर रह गये हैं। जबकि आदिवासी और देशज समाज कभी भी अर्थकेन्द्रित समाज नहीं रहे हैं। आदिवासी-देशज अस्मिता, संस्कृति, परंपरा, ज्ञान-विज्ञान, कला-कौशल और जीवनमूल्यों का आधार जल, जंगल, जमीन और भाषा है। जयपाल सिंह मुंडा ने जिसे संविधान निर्माण के समय पचास के दशक में राजनीतिक तौर पर स्थापित किया। लेकिन देश के नस्लीय, धार्मिक और सांप्रदायिक दलों ने हमेशा इसकी उपेक्षा की।

बहुजन समाज की व्यापक एकजूटता के लिए बौद्धिक रूप से सक्रिय प्रेम कुमार मणि, हिंदी के वरिष्ठ आलोचक डा. चौथीराम यादव, साहित्य अकादमी से सम्मानित संताली लेखिका डा. दमयंती बेसरा और मध्यप्रदेश की सुप्रसिद्ध गोंड विदूषी डा. सुशीला धुर्वे ने महासम्मेलन में शामिल होने की स्वीकृति दी है। प्रवक्ता श्री मुंडा के अनुसार इनके अलावा देश के कई राज्यों से अनेक आदिवासी और मूलवासी लेखक व संस्कृतिकर्मियों ने अखड़ा महासम्मेलन में शामिल होने की सूचना दी है।

अखड़ा प्रवक्ता ने कहा कि वृहत्तर सांस्कृतिक झारखण्ड के किसी भी राज्य में झारखण्डी या आदिवासी भाषा-साहित्य अकादमी, कला अकादमी या सांस्कृतिक संस्थानों की स्थापना नहीं की गई है। हमारे लेखक-कलाकार और संस्कृतिकर्मियों का हक मारकर झारखण्डी भाषा, साहित्य, संस्कृति को मिटाने का षड्यंत्र हो रहा है। ‘मोमेंटम झारखंड’ झारखंड के बहाने तथा रांची कॉलेज का नाम श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नाम पर रखकर रघुवर की भाजपा सरकार संसाधनों की लूट के साथ-साथ झारखंड की सांस्कृतिक पहचान को नष्ट करने पर तुली हुई है। महासम्मेलन में इन्हीं साहित्यिक-सांस्कृतिक सवालों पर विचार होगा और आंदोलन की रूपरेखा बनायी जाएगी।

केएम सिंह मुंडा
केन्द्रीय प्रवक्ता,
झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा